Friday, 11 July 2014

मधुशाला ++






बच्चन जी की मदिरालय से होकर मतवाला,
चला बनाने मैं हाला |
मधुरस का पान कराने साक़ी,
बन आयी योवन बाला ||
झूम उठेगा पीनेवाला,
जब चढ़ेगी हाथों में प्याला |
अब उठ चल अपने मंदिर को,
पुनः बुलाती तेरी अपनी मधुशाला || ०१||



पहले अल्पान कर लूँ तेरा,
फिर लेख उठ पायेगा |
सुप्त हृदयों में भाव जगाती,
प्रबल प्रभावी मधु हाला ||
अगर हुआ तनिक भी मतवाला,
भर जायेगा भावों का प्याला |
मन मानस को तृप्त करने,
खड़ी होगी एक और मधुशाला || ०२||
 

वो काल समय नही इस महास्थिली में ,
जब ना था हाला और न पीने वाला |
इतिहास अमर कर गये,
पीने और पिलानेवाला |
श्रीहरि भी मोहनी साक़ी बन आये,
और पिलाया था हाला |
ऎसे बेजोड़ संस्कृति वाली,
चिर परिचित हैं मधुशाला ||०३||

कोई यहां कहे, कोई वहाँ कहे,
कोई इधर कहे ,कोई उधर कहे,
पूछे यदि कभी पीनेवाला | 
बतला भी दे कोई सूनी गलियां,
भटक ना पाता मतवाला| |
मदमस्त हवाओं के छोंकें,
राह बतलाती पाने को हाला |
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण,
सभी पहुंचाती मधुशाला ||०४||


टूट भी जाये मंदिर मस्जिद ,
छूट सके न हाथों से प्याला |
पतित पावन ये बंधन सबसे,
प्याला और पीने
वाला ||
सुख में हैं भगवान भुलाते,
भूल सका न पात- ए- मधुशाला |
सुख-दुःख में भी साथ निभाती,
सगा सम्बन्धी मधुशाला || ०५||


                                       गम छाया हो या उमंग भरा,
पूरक  होता  है  मधु हाला |
मनरंजीत ना करे मधुबाला,
सदा रंग बिखेरती साकीबाला ||
वक़्त ने  बस हालात हैं बदले,
दूर हुआ  न अधरों से प्याला |
 हर जश्न में चढ़ा प्याला , 
तो दर्द दिनों में पहुंचा मधुशाला || ०६||
              

अंजानो को भी सगा समझा,
वो चढ़ाकर के प्याला |
दिल का दिलदार बनाया,
वो चखाकर के हाला ||
नही जरुरत गीता कुरान की यहां ,
सच बोलता पीनेवाला पीकर  हाला |
गया ना विद्यालय देवालय में,
पाठ सिखाती मधुशाला ||०७||



निर्धन भी जब ले घूंठ में हाला,
मदमस्त घूमता बनकर लाला |
निर्बल भी बलवान समझता,
जब चढ़ जाती उसको हाला ||
ऊँच-नीच छोटा -ऊँचा,
ये सब हैं समाज ने पाला |
सभी दूरियों को कम कर,
अनुराग बढाती मधुशाला ||०८||


जब स्पर्शित होता हैं अधरों को प्याला,
नीरस लगे अधरों से अधरों का ताला |
जब रक्त में अंतरंग होती हाला,
देखते ही बनता मदमस्त निराला ||
होता जब कलह किसी से,
रोषाल्प कराती है  हाला |
जीवन देता हो दर्द मगर ,
मरहम लगाती  मधुशाला ||०९||

 कहा फ़िक्र होता व्यक्ति को,
जब होता वो मतवाला |
जब ढक जातें हैं कपट नैन के,
कण कण में दिखता मधु हाला ||
बैचैन होता राजा अपने निद्रालय में,
मादक सोता बेफ़िक्र  मदिरालय में ||
शांति न देती सारी दुनिया,
सुख वृस्टि करती मधुशाला || १०||

दिन रात भी आराम फरमाते,
जब चढ़ जाती उनको हाला |
रात सूरज समेटे अपनी ज्वाला,
तारों को ढके दिन का उजाला ||
कृति सम्भव नही प्रकृति का ,
उपेक्षित होती यदि मधु हाला |
दसों दिशा आठों पहरों में,
रौनक होती चिराग- ए-मधुशाला || ११||

ऊँच-नीच छोटे-बड़ों  का ,
नही यहाँ हैं बोलाबाला |
श्रुति स्मृति में छा जाता मद,
जब मद्यप होता मतवाला ||
आदत बन जाता जब,
होती नित्य अभ्यासों की माला |
प्रथम स्पर्शित होता जब जिह्वा से हाला,
आदत बन जाता जाना मधुशाला|| १ २ ||





 वो क्या भोग विलास जिया ,
 जिसने चखा नही हो सूरा हाला |
जब एक बार चढ़ा ले प्याला,
बन जायेगा मतवाला ||
दूध-दही  तो बच्चे पीते,
जवां बुजुर्गो को भांति हाला |
बचपन छोड़ उम्र का,
अहसास दिलाती मधुशाला||१३  ||


मदिरालय एक अगर हैं मंदिर ,
भक्त हैं इसके पीनेवाले |
मंदिरों का गंगाजल है,
प्याले में रखा हाला ||
मिले नही हर देशों में,
मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारा |
इतना अपमान कहाँ मदिरा का,
हर देश प्रान्त में प्रतिष्ठित  मधुशाला || १ ४||

बारह महीने फलते फूलते,
पीनेवाला पीकर हाला |
शर्द में गर्म, ग्रीष्म में शीतल,
अहसास कराता मधु हाला ||
सावन में पानी बरसे और ठंड में पड़े पाला,
कुदरत भी  मिज़ाज़ बदलती ओढ़कर ऋतुओं की माला |
मौसम बनाते पीनेवाले,
होती संचित पल्ल्वित मधुशाला|| १५||



देख कलिकाल के प्रभावों को ,
लगे धर्म है खोनेवाला |
पाक स्थलों को  मिलेगा,
कोई न परवरिश करनेवाला ||
उत्कर्ष शिखर में चढ़ जायेगा,
 प्याला लेकर पीनेवाला|
मंदिर मस्जिद हैं कम होनेवाले,
घर घर में होगी मधुशाला ||१६||


 जब राह बढे  मदिरालय से घर को,
थिरकता निकले मतवाला |
देख देख सब मनोरञ्चित होते,
कहते हां अब, हां अब, ये गिरने वाला ||
समझे भी कैसे ये मतवालापन,
जो पीया कभी न हो मधु हाला |
मुस्किल होता है घर को जाना,
पग पग आकर्षित करती मधुशाला || १७||



मद है अमृत कहो न इसको जहरीला ,
कहे जो उसे बुला लो महखाना |
देखे कैसे गुणगान न करता ,
पड़ जायेगा मुह में ताला ||
न्योछावर कर देता सर्वस्व अपना,
आतुर होकर पीने को हाला |
मद बन जाता उसका सुख,
जीवन होता मधुशाला ||१८||
तृप्त  होता  महखाना,
जग को पिला कर के हाला |
गौरान्वित होती महकदे ,
जब पैमाने चढ़ाता मतवाला ||
त्यौहार मनाता मदिरालय ,
झूमता गाता जब  पीनेवाला |
नही स्वार्थ निज अपना होता ,
परहित अर्पित मधुशाला || १९
||



कभी ना छुआ कभी न पीया,
ना स्वप्न में उठाया प्याला |
सुन मतवालों के अफ़साने,
लिखने को चाहा फ़साना ||
खूब छलकाया मन सुराही को,
छलक आया भावों का हाला|
रह संग मादको की संगत में,
रच डाला मधुशाला||२०||
 ************************* इति ***********************


          
          

13 comments:

  1. अच्छी रचना प्रशंशनीय !

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    1. आपका कमेंट हमे प्रोत्साहित करेगा .....धन्यवाद :-D

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  2. Wah bhai wah!! Maza hi aa gaya. Last stanza was the best! Keep it up. :)

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    1. Thank u bhai :-) sirf whi stanza mujhe bachayega :-P:-)

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  3. Mast gayki,khoob likha hai...aapne to rayta fela diya :-)

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  4. Ek Number hai bhai

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  5. I have read ' Madhushala' before and I must say that you have done a really good job Gayiki :) Specially loved your geeky personal touch to the title 'Madhushala++' ! Hoping Bachchans will notice your work ;)

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  6. मधुशाला... एक नये युग की ओर !!!
    बहुत ख़ूबसूरती के साथ लिखा गया ख़ूबसूरत पद्यांश द्य :)

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद ... :-)

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