TheSilentThinker..
Tuesday, 11 December 2018
Tuesday, 27 December 2016
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल ..
ग़ज़ल सम्राट श्री पंकज उदास जी को समर्पित उनकी ही एक मशहूर कृति का नमूना..
***
तारों ने भी की कोशिश-ए-मोहब्बत,और लगे चाँद को यूँ आजमाने में |
आशिक़ी तो एक से की, पर आशिक़ हुए हज़ारों में ||
***
चांदी जैसा अंग है तेरा, तन हीरे सा कमाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल
कंचन लोचन चमक चांदनी सब में तेरा नूर
पुष्प लता गजरे कजरे सब होते तुझसे पूर्ण
सुंदर सजीली रानी जग की तू एकलौती हूर
गोरी तेरी एक झलक से होते लोग निहाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल
बिखरे इतराते झुल्फ़ में नादाँ उलझते लोग
नशीं नशीली आँखों से तेरी भर जाम पाते लोग
नगमे बनते अदा से तेरी शायर बनते लोग
मस्त मस्तानी गोरी तेरी, मोहित करती चाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल
तू मल्लिका हुश्न की ऐसी रातों ख्वाब जगाये
सुरमा सजे आँखों से तेरी मोर पंख सकुचाये
मधु मधुर सी बोली तेरी कोयल भी शरमाये
सरगम बरसे जुबां से तेरी, कहते लोग कमाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल
तेरे हुश्न के चर्चे ऐसे पलक बिछाते लोग
देख देख तुझे महबूबा श्रृंगार सजाते लोग
तू जो हँसें तो नूरी ईद मनाते लोग
सदा मुस्काती रहो कुसुम सी, 'गायकी' करे ख्याल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल
चांदी जैसा अंग है तेरा, तन हीरे सा कमाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल
Sunday, 10 January 2016
फिर भी करते है लोग अक्सर... शिकायत खुदा से यहां..
***
अंधे वो नही जिनकी आँखे नही होती ,
अज्ञ हैं वो जो देख कर भी नज़रअंदाज़ किया करते है ।
***
अपने गुनाहों को हवा कर,
खुद को दगा देते है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ...
मजहब नही सिखाते आपस में लड़ाना,
पर रक्त है बहता बहाने धर्म के यहां ।
राम-रहीम है दोनों एक समान,
पर पढता कौन गीता-क़ुरान है यहां ।
धर्म की आड़ में उठती नफरत की तूफां ,
नासमझ लोग देते सजा भगवान को यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ....
अस्त्रों- शस्त्रों से हो रही,
कोशिश अमन बरसाने की यहां ।
पाक इरादों से होती,
मकशद नफ़रत फ़ैलाने की यहां ।
दरिंदो को है सिर्फ,
अपनी दहशत का लोहा मनवाना ।
इतिहास पढ़कर भी करते,
गुस्ताखी इतिहास-ए-जुल्म बनाना ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां...
फरेब-अधम में डूबता ये जहां,
कोई रोके इन्हे तो अक्सर मिटा दिए जाते है यहां ।
अब तो पाप की हवन शमां में,
सत्य की आहूति चढ़ती परवानो की तरह ।
देश-भक्ति स्वदेश-प्रेम का,
ज़िक्र होता पुरानी किताबो में ।
पर इतिहास के पन्ने पलटने का,
वक़्त इतना किसके पास है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ...
अध्यात्म ज्ञान दिया जहां पवित्र आत्माओ ने,
फिर भी बेखबर है लोग अहंकार अज्ञान से यहां ।
धर्म की कट्टरता में भूल बैठे है,
खुद को इंसान बनाना ।
अफ़सोस होता है पावन धरा में,
यूँ कोहराम मच रहा है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ...
अपने गुनाहों पे परदा कर
औरों की ऐब पे हल्ला मचाते है यहां ।
लोग भी चिरागों के शोक से,
गैरों की खुशियों में आग लगाते है यहां ।
कितने खुदगर्ज़ है लोग ज़माने में,
शोहरत के वास्ते करते नीलाम ईमान यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ..
असूलों ज़मीर का ज़िक्र
भी अब गवारा हुआ ।
दौलत तय करती है,
कीमत इंसान की यहां ।
अब तो इबादत में भी लोग,
चाह अमानत की रखते है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ....
नेता भी नक़ाब पहनकर,
आस दिलाते झूठे वादों से ।
देश भी लूट रहा,
वास्ते देश चलाने वालों के ।
दल विरोध करते भी तो एक-दूजे का,
मसलों पर ऐतराज़ कौन करता है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ....
चहुंओर मंडराता ये अमानवीयता का खौफनाक मंज़र,
धर्म को लहूलुहान करता अधर्म का खंजर ।
छल-धोखों के किस्से अब तो सरेआम है यहां,
शोषण-बुराईयों के चर्चे आम है यहां ।
ज़माने को है चाहत शान-ए-शौकत की यहां ,
अरमानो के लिए देते लोग शहादत है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां..
मैं भी कितना नासमझ हूँ,
जो चला यूँ नुमाइशे लेकर ।
गुनाह मैंने भी किये है,
हालातों को यूँ नज़रअंदाज़ कर।
हंगामा मचाना मेरी फितरत में नही,
एक यत्न है समझने और समझाने की यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां...
Wednesday, 4 February 2015
Ankit Weds Preeti
जीवन में खुशिओं की अगुवाई का ।
दोस्तों के जन्मो तक के मिलन का ,
सफ़र शुरू हो रही मोहब्बत करने वालों का ।।
बेला गुंजित होगी ढोल शहनाई से ,
सजेगी बारात उठेगी डोली रौनक़ से ।
ख़ुशनसीब होंगे जवाँ वादों -मुबारकबादों से ,
हम भी करते है कुछ फ़रियाद अपने रब से ।।
जीवन हो अंकित खुशियों की बौछारों से ,
प्रीती बढ़ती रहे इस बंधन में तेरे आशीषों की छाँव में।
ताजगी बरकरार रहे इनके रिश्तों में उम्रभर ,
दोस्तों की दुआओं को दोस्ती के लिए मुक्कमल कर ।।
ज़िन्दगी गुन-गुनाये संगीत की तरह ,
ऐसे इनके जीवन में तू मधुर साज कर ।
रहे गुल-ए - ख़ुशी इनके दामन में हरपल ,
तू अपने ख़ास रहम -ए -निज़ाम कर ।।
मिले हर ख़ुशी तेरी इबादत से,
हो हसरते पूरी तेरी इनायत से ।
रस्मों रिवाजो के इस सिलसिले में इस कदर बंधे ये नव जवां ,
कि कायनात भी सिमट जाये इनकी मोहब्बत में ।।
इस रिश्ते पर किसी की नजर न लगे ,
इस पर तू अपनी खास नजर रख ।
बेशक जीवन सुख-दुःख का संगम है ,
सुख इनके नाम और दुःख दोस्ती में कुर्बान कर ।।
रहे सलामत हर वक़्त आसमान की छांव में ,
खुशिया दे जमीं अपने पनाह में ।
सूरज चाँद सितारों सी रोशन हो ज़िंदगी ,
लाज़मी रिश्तों की बुनियाद पे सँवर जाये बंदगी ।।
ईश्वर तुमसे यही विनती है ,
हमारी विनय स्वीकार कर ।
बधाई-ए- शादी देते हैं दिल से दोस्तों को ,
पैगाम पहुंचा कर हम पर उपकार कर ।।
MCA'12,
NIT TRICHY .
Friday, 11 July 2014
मधुशाला ++
बच्चन जी की मदिरालय से होकर मतवाला,
चला बनाने मैं हाला |
मधुरस का पान कराने साक़ी,
बन आयी योवन बाला ||
झूम उठेगा पीनेवाला,
जब चढ़ेगी हाथों में प्याला |
अब उठ चल अपने मंदिर को,
पुनः बुलाती तेरी अपनी मधुशाला || ०१||
पहले अल्पान कर लूँ तेरा,
फिर लेख उठ पायेगा |
सुप्त हृदयों में भाव जगाती,
प्रबल प्रभावी मधु हाला ||
अगर हुआ तनिक भी मतवाला,
भर जायेगा भावों का प्याला |
मन मानस को तृप्त करने,
खड़ी होगी एक और मधुशाला || ०२||
फिर लेख उठ पायेगा |
सुप्त हृदयों में भाव जगाती,
प्रबल प्रभावी मधु हाला ||
अगर हुआ तनिक भी मतवाला,
भर जायेगा भावों का प्याला |
मन मानस को तृप्त करने,
खड़ी होगी एक और मधुशाला || ०२||
वो काल समय नही इस महास्थिली में ,
जब ना था हाला और न पीने वाला |
इतिहास अमर कर गये,
पीने और पिलानेवाला |
श्रीहरि भी मोहनी साक़ी बन आये,
और पिलाया था हाला |
ऎसे बेजोड़ संस्कृति वाली,
चिर परिचित हैं मधुशाला ||०३||
जब ना था हाला और न पीने वाला |
इतिहास अमर कर गये,
पीने और पिलानेवाला |
श्रीहरि भी मोहनी साक़ी बन आये,
और पिलाया था हाला |
ऎसे बेजोड़ संस्कृति वाली,
चिर परिचित हैं मधुशाला ||०३||
कोई यहां कहे, कोई वहाँ कहे,
कोई इधर कहे ,कोई उधर कहे,
पूछे यदि कभी पीनेवाला |
बतला भी दे कोई सूनी गलियां,
भटक ना पाता मतवाला| |
मदमस्त हवाओं के छोंकें,
राह बतलाती पाने को हाला |
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण,
सभी पहुंचाती मधुशाला ||०४||
कोई इधर कहे ,कोई उधर कहे,
पूछे यदि कभी पीनेवाला |
बतला भी दे कोई सूनी गलियां,
भटक ना पाता मतवाला| |
मदमस्त हवाओं के छोंकें,
राह बतलाती पाने को हाला |
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण,
सभी पहुंचाती मधुशाला ||०४||
टूट भी जाये मंदिर मस्जिद ,
छूट सके न हाथों से प्याला |
पतित पावन ये बंधन सबसे,
प्याला और पीनेवाला ||
सुख में हैं भगवान भुलाते,
भूल सका न पात- ए- मधुशाला |
सुख-दुःख में भी साथ निभाती,
सगा सम्बन्धी मधुशाला || ०५||
छूट सके न हाथों से प्याला |
पतित पावन ये बंधन सबसे,
प्याला और पीनेवाला ||
सुख में हैं भगवान भुलाते,
भूल सका न पात- ए- मधुशाला |
सुख-दुःख में भी साथ निभाती,
सगा सम्बन्धी मधुशाला || ०५||
गम छाया हो या उमंग भरा,
पूरक होता है मधु हाला |
मनरंजीत ना करे मधुबाला,
सदा रंग बिखेरती साकीबाला ||
वक़्त ने बस हालात हैं बदले,
दूर हुआ न अधरों से प्याला |
हर जश्न में चढ़ा प्याला ,
तो दर्द दिनों में पहुंचा मधुशाला || ०६||
पूरक होता है मधु हाला |
मनरंजीत ना करे मधुबाला,
सदा रंग बिखेरती साकीबाला ||
वक़्त ने बस हालात हैं बदले,
दूर हुआ न अधरों से प्याला |
हर जश्न में चढ़ा प्याला ,
तो दर्द दिनों में पहुंचा मधुशाला || ०६||
अंजानो को भी सगा समझा,
वो चढ़ाकर के प्याला |
दिल का दिलदार बनाया,
वो चखाकर के हाला ||
नही जरुरत गीता कुरान की यहां ,
सच बोलता पीनेवाला पीकर हाला |
गया ना विद्यालय देवालय में,
पाठ सिखाती मधुशाला ||०७||
निर्धन भी जब ले घूंठ में हाला,
मदमस्त घूमता बनकर लाला |
निर्बल भी बलवान समझता,
जब चढ़ जाती उसको हाला ||
ऊँच-नीच छोटा -ऊँचा,
ये सब हैं समाज ने पाला |
सभी दूरियों को कम कर,
अनुराग बढाती मधुशाला ||०८||
मदमस्त घूमता बनकर लाला |
निर्बल भी बलवान समझता,
जब चढ़ जाती उसको हाला ||
ऊँच-नीच छोटा -ऊँचा,
ये सब हैं समाज ने पाला |
सभी दूरियों को कम कर,
अनुराग बढाती मधुशाला ||०८||
जब स्पर्शित होता हैं अधरों को प्याला,
नीरस लगे अधरों से अधरों का ताला |
जब रक्त में अंतरंग होती हाला,
देखते ही बनता मदमस्त निराला ||
होता जब कलह किसी से,
रोषाल्प कराती है हाला |
जीवन देता हो दर्द मगर ,
मरहम लगाती मधुशाला ||०९||
नीरस लगे अधरों से अधरों का ताला |
जब रक्त में अंतरंग होती हाला,
देखते ही बनता मदमस्त निराला ||
होता जब कलह किसी से,
रोषाल्प कराती है हाला |
जीवन देता हो दर्द मगर ,
मरहम लगाती मधुशाला ||०९||
कहा फ़िक्र होता व्यक्ति को,
जब होता वो मतवाला |
जब ढक जातें हैं कपट नैन के,
कण कण में दिखता मधु हाला ||
बैचैन होता राजा अपने निद्रालय में,
मादक सोता बेफ़िक्र मदिरालय में ||
शांति न देती सारी दुनिया,
सुख वृस्टि करती मधुशाला || १०||
जब होता वो मतवाला |
जब ढक जातें हैं कपट नैन के,
कण कण में दिखता मधु हाला ||
बैचैन होता राजा अपने निद्रालय में,
मादक सोता बेफ़िक्र मदिरालय में ||
शांति न देती सारी दुनिया,
सुख वृस्टि करती मधुशाला || १०||
दिन रात भी आराम फरमाते,
जब चढ़ जाती उनको हाला |
रात सूरज समेटे अपनी ज्वाला,
तारों को ढके दिन का उजाला ||
कृति सम्भव नही प्रकृति का ,
उपेक्षित होती यदि मधु हाला |
दसों दिशा आठों पहरों में,
रौनक होती चिराग- ए-मधुशाला || ११||
जब चढ़ जाती उनको हाला |
रात सूरज समेटे अपनी ज्वाला,
तारों को ढके दिन का उजाला ||
कृति सम्भव नही प्रकृति का ,
उपेक्षित होती यदि मधु हाला |
दसों दिशा आठों पहरों में,
रौनक होती चिराग- ए-मधुशाला || ११||
ऊँच-नीच छोटे-बड़ों का ,
नही यहाँ हैं बोलाबाला |
श्रुति स्मृति में छा जाता मद,
जब मद्यप होता मतवाला ||
आदत बन जाता जब,
होती नित्य अभ्यासों की माला |
प्रथम स्पर्शित होता जब जिह्वा से हाला,
आदत बन जाता जाना मधुशाला|| १ २ ||
नही यहाँ हैं बोलाबाला |
श्रुति स्मृति में छा जाता मद,
जब मद्यप होता मतवाला ||
आदत बन जाता जब,
होती नित्य अभ्यासों की माला |
प्रथम स्पर्शित होता जब जिह्वा से हाला,
आदत बन जाता जाना मधुशाला|| १ २ ||
वो क्या भोग विलास जिया ,
जिसने चखा नही हो सूरा हाला |
जब एक बार चढ़ा ले प्याला,
बन जायेगा मतवाला ||
दूध-दही तो बच्चे पीते,
जवां बुजुर्गो को भांति हाला |
बचपन छोड़ उम्र का,
अहसास दिलाती मधुशाला||१३ ||
जिसने चखा नही हो सूरा हाला |
जब एक बार चढ़ा ले प्याला,
बन जायेगा मतवाला ||
दूध-दही तो बच्चे पीते,
जवां बुजुर्गो को भांति हाला |
बचपन छोड़ उम्र का,
अहसास दिलाती मधुशाला||१३ ||
मदिरालय एक अगर हैं मंदिर ,
भक्त हैं इसके पीनेवाले |
मंदिरों का गंगाजल है,
प्याले में रखा हाला ||
मिले नही हर देशों में,
मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारा |
इतना अपमान कहाँ मदिरा का,
हर देश प्रान्त में प्रतिष्ठित मधुशाला || १ ४||
भक्त हैं इसके पीनेवाले |
मंदिरों का गंगाजल है,
प्याले में रखा हाला ||
मिले नही हर देशों में,
मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारा |
इतना अपमान कहाँ मदिरा का,
हर देश प्रान्त में प्रतिष्ठित मधुशाला || १ ४||
बारह महीने फलते फूलते,
पीनेवाला पीकर हाला |
शर्द में गर्म, ग्रीष्म में शीतल,
अहसास कराता मधु हाला ||
सावन में पानी बरसे और ठंड में पड़े पाला,
कुदरत भी मिज़ाज़ बदलती ओढ़कर ऋतुओं की माला |
मौसम बनाते पीनेवाले,
होती संचित पल्ल्वित मधुशाला|| १५||
पीनेवाला पीकर हाला |
शर्द में गर्म, ग्रीष्म में शीतल,
अहसास कराता मधु हाला ||
सावन में पानी बरसे और ठंड में पड़े पाला,
कुदरत भी मिज़ाज़ बदलती ओढ़कर ऋतुओं की माला |
मौसम बनाते पीनेवाले,
होती संचित पल्ल्वित मधुशाला|| १५||
देख कलिकाल के प्रभावों को ,
लगे धर्म है खोनेवाला |
पाक स्थलों को मिलेगा,
कोई न परवरिश करनेवाला ||
उत्कर्ष शिखर में चढ़ जायेगा,
प्याला लेकर पीनेवाला|
मंदिर मस्जिद हैं कम होनेवाले,
घर घर में होगी मधुशाला ||१६||
लगे धर्म है खोनेवाला |
पाक स्थलों को मिलेगा,
कोई न परवरिश करनेवाला ||
उत्कर्ष शिखर में चढ़ जायेगा,
प्याला लेकर पीनेवाला|
मंदिर मस्जिद हैं कम होनेवाले,
घर घर में होगी मधुशाला ||१६||
जब राह बढे मदिरालय से घर को,
थिरकता निकले मतवाला |
देख देख सब मनोरञ्चित होते,
कहते हां अब, हां अब, ये गिरने वाला ||
समझे भी कैसे ये मतवालापन,
जो पीया कभी न हो मधु हाला |
मुस्किल होता है घर को जाना,
पग पग आकर्षित करती मधुशाला || १७||
थिरकता निकले मतवाला |
देख देख सब मनोरञ्चित होते,
कहते हां अब, हां अब, ये गिरने वाला ||
समझे भी कैसे ये मतवालापन,
जो पीया कभी न हो मधु हाला |
मुस्किल होता है घर को जाना,
पग पग आकर्षित करती मधुशाला || १७||
मद है अमृत कहो न इसको जहरीला ,
कहे जो उसे बुला लो महखाना |
देखे कैसे गुणगान न करता ,
पड़ जायेगा मुह में ताला ||
न्योछावर कर देता सर्वस्व अपना,
आतुर होकर पीने को हाला |
मद बन जाता उसका सुख,
जीवन होता मधुशाला ||१८||
कहे जो उसे बुला लो महखाना |
देखे कैसे गुणगान न करता ,
पड़ जायेगा मुह में ताला ||
न्योछावर कर देता सर्वस्व अपना,
आतुर होकर पीने को हाला |
मद बन जाता उसका सुख,
जीवन होता मधुशाला ||१८||
तृप्त होता महखाना,
जग को पिला कर के हाला |
गौरान्वित होती महकदे ,
जब पैमाने चढ़ाता मतवाला ||
त्यौहार मनाता मदिरालय ,
झूमता गाता जब पीनेवाला |
नही स्वार्थ निज अपना होता ,
परहित अर्पित मधुशाला || १९||
जग को पिला कर के हाला |
गौरान्वित होती महकदे ,
जब पैमाने चढ़ाता मतवाला ||
त्यौहार मनाता मदिरालय ,
झूमता गाता जब पीनेवाला |
नही स्वार्थ निज अपना होता ,
परहित अर्पित मधुशाला || १९||
कभी ना छुआ कभी न पीया,
ना स्वप्न में उठाया प्याला |
सुन मतवालों के अफ़साने,
लिखने को चाहा फ़साना ||
खूब छलकाया मन सुराही को,
छलक आया भावों का हाला|
रह संग मादको की संगत में,
रच डाला मधुशाला||२०||
ना स्वप्न में उठाया प्याला |
सुन मतवालों के अफ़साने,
लिखने को चाहा फ़साना ||
खूब छलकाया मन सुराही को,
छलक आया भावों का हाला|
रह संग मादको की संगत में,
रच डाला मधुशाला||२०||
************************* इति ***********************
Monday, 14 January 2013
वक़्त.....
वक़्त मेहरबान तो बन्दा पहलवान
वक़्त नाराज तो बन्दा परेशान
वक़्त के आगे नतमस्तक भगवान्
वक़्त की चाल में चले जहान
वक़्त की वार से बड़ी कोई मार नहीं
वक़्त को रोक सके ऐसा कोई दीवार नही
वक़्त को हरा सके ऐसा कोई महान नहीं
वक़्त को जकड़ सके ऐसा किसी को वरदान नही
राजा को रंक बनाता वक़्त
सूरज को रोज सुलाता वक़्त
तारों को रात जगाता वक़्त
पल में हसाता-रुलाता वक़्त
वक़्त की चाल से कोई अनजान नही
वक़्त लौट कर आये ऐसा कभी हुआ नही
संसार भले ही सोया,पर वक़्त कभी सोया नही
लोंगो ने वक़्त गंवाया पर वक़्त कभी कुछ खोया नही
वक़्त ही देता जीवनदान, वक़्त ही लेता सबकी जान
वक़्त ही है सबसे अनमोल धन , वक़्त ही है सबसे बलवान
वक़्त को भुनाया जिसने, वो ही कुछ पाया है
वक़्त को गंवाया जिसने, वो ही अंत पछताया है
वक़्त को पहचान सके वो ही बड़ा ज्ञानी है
वक़्त को तबाह करे वो ही बड़ा अज्ञानी है
Saturday, 22 December 2012
GBH...
यूँ तो जिंदगी बेहसीन थी, एक पाक ऐ नजरियें ने हसीन बना दिया !
किसी से जीना सीखा ,तो किसी को जीना सिखा गया !!
**
संभल -संभल कर चलना सीखा ,दूसरों को गिरता देख कर !
गिरा कही किसी भूल से, सबक समझा गया मुझे गिरा देखकर !!
**
माँ एक देवी है जिस पर किसको नाज़ नही होता,
माँ से बढकर कभी भगवान् नही होता,
माँ नहीं होती तो तू क्या तेरा बाप नहीं होता !!
**
मगर गुरुर इतना की ,मरने के बाद भी लोग अकड़ते हैं !!
**
लोग अक्सर विश्वास जीत कर, जान ले लेते हैं ,
शख्स हम ऐसे हैं, जो जान देकर विश्वास जीत लेते हैं !!
**
कल किसने है देखा ? फिर इसकी परवाह क्यूँ करूँ !
जीना तो आज है मुझे, कल का इंतज़ार क्यूँ करूँ !!
**
आकृति में विकृति नई कृति को आकृति प्रदान करती है !
**
यक़ीनन वो कांच ही होते है जो ठोकरों से बिखर जाया करते हैं, सहनशील पत्थर ही तो ठोकरों से तरासे जाते हैं !!
**
लज़ीज़ दोस्ती भी उन्ही तक़दीर वालों को नसीब होती होंगी, जिन्होंने शायद खुदा से भी, जिंदगी में साँसे कम दोस्त बेशुमार मांगे होंगे !!
**
कुछ तो बातें है इन लहरों में, जो कुछ कहना चाहती है
कुछ तो बातें है इन किनारों में, जो इतना सहना जानती है
कुछ अजीब सा रिश्ता है इन दोनों में
जो पल में मिलना और फिर पल में बिछड़ना चाहती है
**
सरल मन से मिला करो उम्रदराज़ लोगो से,
गर हुए खुशनसीब तो |
उम्र भर का तजुर्बा भी मिल जायेगा,
बगैर उम्र के बड़ी उम्र वालों से ||
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