Tuesday, 27 December 2016

एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल ..


ग़ज़ल सम्राट श्री पंकज उदास जी को समर्पित उनकी ही एक मशहूर कृति का नमूना..
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 तारों ने भी की कोशिश-ए-मोहब्बत,और लगे चाँद को यूँ आजमाने में |
        आशिक़ी तो एक से की, पर आशिक़ हुए हज़ारों में ||
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चांदी जैसा अंग है तेरा, तन हीरे सा कमाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल

कंचन लोचन चमक चांदनी सब में तेरा नूर
पुष्प लता गजरे कजरे सब होते तुझसे पूर्ण
सुंदर सजीली रानी जग की तू एकलौती हूर
गोरी तेरी एक झलक से होते लोग निहाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल

बिखरे इतराते झुल्फ़ में नादाँ उलझते लोग
नशीं नशीली आँखों से तेरी भर जाम पाते लोग
नगमे बनते अदा से तेरी शायर बनते लोग
मस्त मस्तानी गोरी तेरी, मोहित करती चाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल


तू मल्लिका हुश्न की ऐसी रातों ख्वाब जगाये
सुरमा सजे आँखों से तेरी मोर पंख सकुचाये 
मधु मधुर सी बोली  तेरी कोयल भी शरमाये 
सरगम बरसे जुबां से तेरी, कहते लोग कमाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल

तेरे हुश्न के चर्चे ऐसे पलक बिछाते लोग
देख देख तुझे महबूबा श्रृंगार सजाते लोग
तू जो हँसें तो नूरी ईद मनाते लोग
सदा मुस्काती रहो कुसुम सी, 'गायकी' करे ख्याल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल

चांदी जैसा अंग है तेरा, तन हीरे सा कमाल
एक तू ही धनवान है छोरी, बाकी सब कंगाल

Sunday, 10 January 2016

फिर भी करते है लोग अक्सर... शिकायत खुदा से यहां..



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अंधे वो नही जिनकी आँखे नही होती ,
अज्ञ हैं वो जो देख कर भी नज़रअंदाज़ किया करते है  
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अपने गुनाहों को हवा कर,
खुद को दगा देते है यहां 
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ...  

मजहब नही सिखाते आपस में लड़ाना,
पर रक्त है बहता बहाने धर्म के यहां 
राम-रहीम है दोनों एक समान,  
पर पढता कौन गीता-क़ुरान है यहां 
धर्म की आड़ में उठती नफरत की तूफां , 
नासमझ लोग देते सजा भगवान को यहां 
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ....


अस्त्रों- शस्त्रों से हो रही, 
कोशिश अमन बरसाने की यहां 
पाक इरादों से होती,  
मकशद नफ़रत फ़ैलाने की यहां 
दरिंदो को है सिर्फ,
अपनी दहशत का लोहा मनवाना  
इतिहास पढ़कर भी करते,
गुस्ताखी इतिहास-ए-जुल्म  बनाना 
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां...


फरेब-अधम में डूबता ये जहां, 
कोई रोके इन्हे तो अक्सर मिटा दिए जाते है यहां  
अब तो पाप की हवन शमां में,  
सत्य की आहूति चढ़ती परवानो की तरह 
देश-भक्ति स्वदेश-प्रेम का,  
ज़िक्र होता पुरानी किताबो में 
पर इतिहास के पन्ने पलटने का,
वक़्त इतना किसके पास है यहां   
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ...

अध्यात्म ज्ञान दिया जहां पवित्र आत्माओ ने, 
फिर भी बेखबर है लोग अहंकार अज्ञान से यहां 
धर्म की कट्टरता में भूल बैठे है,
खुद को इंसान बनाना 
अफ़सोस होता है पावन धरा में,
यूँ कोहराम मच रहा है यहां 
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ...


अपने गुनाहों पे परदा कर 
औरों की ऐब पे हल्ला मचाते है यहां  
लोग भी चिरागों के शोक से,  
गैरों की खुशियों में आग लगाते है यहां  
कितने खुदगर्ज़ है लोग ज़माने में, 
शोहरत के वास्ते करते नीलाम ईमान यहां  
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ..

असूलों ज़मीर का ज़िक्र   
भी अब गवारा हुआ 
दौलत तय करती है,  
कीमत इंसान की यहां 
अब तो इबादत में भी लोग, 
चाह अमानत की रखते है यहां  
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ....


नेता भी नक़ाब पहनकर, 
आस दिलाते झूठे वादों से 
देश भी लूट रहा,  
वास्ते देश चलाने वालों के  
दल विरोध करते भी तो एक-दूजे का,  
मसलों पर ऐतराज़ कौन करता है यहां 
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां ....

चहुंओर मंडराता ये अमानवीयता का खौफनाक मंज़र,   
धर्म को लहूलुहान करता अधर्म का खंजर  
छल-धोखों के किस्से अब तो सरेआम है यहां, 
शोषण-बुराईयों के चर्चे आम है यहां 
ज़माने को है चाहत शान-ए-शौकत की यहां , 
अरमानो के लिए देते लोग शहादत है यहां 
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां..


मैं भी कितना नासमझ हूँ, 
जो चला यूँ नुमाइशे लेकर 
गुनाह मैंने भी किये है, 
हालातों को यूँ नज़रअंदाज़ कर
हंगामा मचाना मेरी फितरत में नही, 
एक यत्न है समझने और समझाने की यहां  
फिर भी करते है लोग अक्सर, 
शिकायत खुदा से यहां...