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अंधे वो नही जिनकी आँखे नही होती ,
अज्ञ हैं वो जो देख कर भी नज़रअंदाज़ किया करते है ।
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अपने गुनाहों को हवा कर,
खुद को दगा देते है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ...
मजहब नही सिखाते आपस में लड़ाना,
पर रक्त है बहता बहाने धर्म के यहां ।
राम-रहीम है दोनों एक समान,
पर पढता कौन गीता-क़ुरान है यहां ।
धर्म की आड़ में उठती नफरत की तूफां ,
नासमझ लोग देते सजा भगवान को यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ....
अस्त्रों- शस्त्रों से हो रही,
कोशिश अमन बरसाने की यहां ।
पाक इरादों से होती,
मकशद नफ़रत फ़ैलाने की यहां ।
दरिंदो को है सिर्फ,
अपनी दहशत का लोहा मनवाना ।
इतिहास पढ़कर भी करते,
गुस्ताखी इतिहास-ए-जुल्म बनाना ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां...
फरेब-अधम में डूबता ये जहां,
कोई रोके इन्हे तो अक्सर मिटा दिए जाते है यहां ।
अब तो पाप की हवन शमां में,
सत्य की आहूति चढ़ती परवानो की तरह ।
देश-भक्ति स्वदेश-प्रेम का,
ज़िक्र होता पुरानी किताबो में ।
पर इतिहास के पन्ने पलटने का,
वक़्त इतना किसके पास है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ...
अध्यात्म ज्ञान दिया जहां पवित्र आत्माओ ने,
फिर भी बेखबर है लोग अहंकार अज्ञान से यहां ।
धर्म की कट्टरता में भूल बैठे है,
खुद को इंसान बनाना ।
अफ़सोस होता है पावन धरा में,
यूँ कोहराम मच रहा है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ...
अपने गुनाहों पे परदा कर
औरों की ऐब पे हल्ला मचाते है यहां ।
लोग भी चिरागों के शोक से,
गैरों की खुशियों में आग लगाते है यहां ।
कितने खुदगर्ज़ है लोग ज़माने में,
शोहरत के वास्ते करते नीलाम ईमान यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ..
असूलों ज़मीर का ज़िक्र
भी अब गवारा हुआ ।
दौलत तय करती है,
कीमत इंसान की यहां ।
अब तो इबादत में भी लोग,
चाह अमानत की रखते है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ....
नेता भी नक़ाब पहनकर,
आस दिलाते झूठे वादों से ।
देश भी लूट रहा,
वास्ते देश चलाने वालों के ।
दल विरोध करते भी तो एक-दूजे का,
मसलों पर ऐतराज़ कौन करता है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां ....
चहुंओर मंडराता ये अमानवीयता का खौफनाक मंज़र,
धर्म को लहूलुहान करता अधर्म का खंजर ।
छल-धोखों के किस्से अब तो सरेआम है यहां,
शोषण-बुराईयों के चर्चे आम है यहां ।
ज़माने को है चाहत शान-ए-शौकत की यहां ,
अरमानो के लिए देते लोग शहादत है यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां..
मैं भी कितना नासमझ हूँ,
जो चला यूँ नुमाइशे लेकर ।
गुनाह मैंने भी किये है,
हालातों को यूँ नज़रअंदाज़ कर।
हंगामा मचाना मेरी फितरत में नही,
एक यत्न है समझने और समझाने की यहां ।
फिर भी करते है लोग अक्सर,
शिकायत खुदा से यहां...
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ReplyDeleteVery Pure n crisp :)
ReplyDeleteLoved it!!
best one is "राम-रहीम है दोनों एक समान,
पर पढता कौन गीता-क़ुरान है यहां ।"
Thanks Rai Saab:-)
DeleteVery nice
ReplyDeleteThanks Rashmi :-)
Deleteबहुत खूब! आज के सत्य को बहुत खूबसूरती से बयां किया है! ��
ReplyDeleteबहुत खूब! आज के सत्य को बहुत खूबसूरती से बयां किया है! ��
ReplyDeleteThanks Pondy ..hmm thodi koshish ki h maine :-)
DeleteThanks Tanya :-)
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